सीबीआई ने निचली अदालत की टिप्पणी को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। मुकदमे के दौरान, सीबीआई ने कहा था कि पीड़िता द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन पर जांच अधिकारी के दावे महज राय थे, ना कि निर्णायक सबूत, और केवल उस आधार पर, कोई धारणा नहीं बनाई जा सकती कि अधिकारी आरोपी का पक्ष ले रहा था।
अदालत ने कहा था, ‘‘मामले में जो दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई और जांच अधिकारी/सीबीआई का रवैया इस बात का संकेत देता है कि लड़की का बयान वर्तमान मामले में पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों के कथन को अविश्वसनीय ठहराने के उद्देश्य से दर्ज किया गया।’’

























