International
oi-Siddharth Purohit
अफगानिस्तान
के
तालिबान
शासन
के
विदेश
मंत्री
आमिर
खान
मुत्तकी
ने
भारत
की
अपनी
छह
दिवसीय
यात्रा
के
तहत
11
अक्टूबर,
2025
को
उत्तर
प्रदेश
के
सहारनपुर
जिले
में
स्थित
इस्लामी
मदरसा
दारुल
उलूम
देवबंद
का
दौरा
किया।
मुत्तकी
ने
इस
दौरे
पर
कहा,-
“मैं
देवबंद
के
उलेमा
और
क्षेत्र
के
लोगों
का
इस
गर्मजोशी
से
स्वागत
के
लिए
आभारी
हूं।
भारत-अफगानिस्तान
संबंधों
का
भविष्य
बहुत
उज्ज्वल
दिख
रहा
है।”
भारत-तालिबान
संबंधों
में
नई
शुरुआत
यह
यात्रा
नई
दिल्ली
के
तालिबान
के
साथ
कामकाजी
संबंध
स्थापित
करने
के
प्रयासों
में
एक
महत्वपूर्ण
कदम
मानी
जा
रही
है।
हालांकि
भारत,
वैश्विक
समुदाय
के
एक
बड़े
हिस्से
की
तरह,
काबुल
में
इस
शासन
को
आधिकारिक
तौर
पर
मान्यता
नहीं
देता
है।
मुत्तकी
ने
शुक्रवार
को
कहा
था,-
“देवबंद
इस्लामी
दुनिया
का
एक
बड़ा
केंद्र
है,
और
अफगानिस्तान
और
देवबंद
जुड़े
हुए
हैं।
हम
चाहते
हैं
कि
हमारे
आध्यात्मिक
छात्र
यहां
आकर
भी
अध्ययन
करें।”

दारुल
उलूम
देवबंद
का
इतिहास
और
स्थापना
दारुल
उलूम
देवबंद,
सहारनपुर
जिले
के
देवबंद
शहर
में
स्थित
एक
इस्लामी
मदरसा
है,
जिसने
भारत
और
दुनिया
भर
के
इस्लामी
विद्वानों
को
तैयार
किया
है।
इस
मदरसे
की
स्थापना
1800
के
दशक
के
अंत
में
सय्यद
मुहम्मद
आबिद,
फजलुर
रहमान
उस्मानी,
महताब
अली
देवबंदी
और
उनके
साथियों
ने
की
थी।
वर्तमान
परिसर
की
नींव
मुहम्मद
कासिम
नानौतवी
ने
रखी
थी।
यह
मदरसा
मुख्य
रूप
से
मनकूलात,
यानी
कुरान
और
हदीस
जैसे
स्रोतों
से
ग्रंथों
और
परंपराओं
के
अध्ययन
पर
आधारित
इस्लामी
शिक्षा
प्रदान
करता
है।
लेकिन
दारुल
उलूम
की
धार्मिक
कट्टरता
को
लेकर
भी
कई
लोगों
ने
अलग-अलग
समय
पर
सवाल
उठाए
हैं।
मदरसे
में
क्या-क्या
है?
2020
की
एक
रिपोर्ट
के
अनुसार,
इस
इस्लामी
मदरसे
में
34
विभाग
और
4,000
से
अधिक
छात्र
अध्ययन
कर
रहे
थे।
उस
समय
मदरसे
के
मीडिया
प्रभारी
अशरफ
उस्मानी
के
अनुसार,
एक
छात्र
8
साल
के
अध्ययन
के
बाद
मौलवियत
(मौलाना)
की
डिग्री
प्राप्त
करता
है,
जिसके
बाद
सफल
छात्र
साहित्य,
फतवा,
तफसीर
(कुरान
की
व्याख्या),
हदीस,
अंग्रेजी,
कंप्यूटर
आदि
में
विशेषज्ञता
का
विकल्प
चुनते
हैं।
सांप्रदायिक
समझ
और
धर्म
अशरफ
उस्मानी
ने
बताया
कि
छात्रों
के
लिए
देश
के
धर्मों,
संस्कृति
और
विरासत
के
बारे
में
एक
समग्र
दृष्टिकोण
विकसित
करने
के
लिए
हिंदू
धर्म
और
दर्शन
पर
साप्ताहिक
कक्षाएं
लेना
जरूरी
था।
दारुल
उलूम
देवबंद
की
वेबसाइट
सय्यद
मुहम्मद
आबिद,
फजलुर
रहमान
उस्मानी,
महताब
अली
देवबंदी
और
मुहम्मद
कासिम
नानौतवी
के
अलावा
जुल्फिकार
अली
देवबंदी,
फजल
हक
देवबंदी
और
शेख
निहाल
देवबंदी
को
भी
संस्थापक
के
रूप
में
बताती
है।
इस्लामी
शिक्षा
का
वैश्विक
केंद्र
कैसे
बना
देवबंद?
मदरसे
की
वेबसाइट
के
अनुसार,
दारुल
उलूम
देवबंद
इस्लामी
दुनिया
में
एक
धार्मिक
और
शैक्षणिक
केंद्र
के
रूप
में
प्रसिद्ध
है।
वेबसाइट
कहती
है,-
“उपमहाद्वीप
में,
यह
इस्लाम
के
प्रसार
और
प्रचार
के
लिए
सबसे
बड़ी
संस्था
है
और
इस्लामी
विज्ञान
में
शिक्षा
का
सबसे
बड़ा
स्रोत
है।
बगदाद
के
पतन
के
बाद
काहिरा
इस्लामी
कला
और
विज्ञान
का
केंद्र
बन
गया,
उसी
तरह
दिल्ली
के
पतन
के
बाद,
शैक्षणिक
केंद्रीयता
देवबंद
के
हिस्से
में
आई।”
तालिबान
और
देवबंद
का
क्या
कनेक्शन?
कई
तालिबान
नेता
इस
मदरसे
को
बहुत
सम्मान
देते
हैं।
तालिबान
समूह
के
कई
वरिष्ठ
कमांडरों
और
नेताओं
ने
पाकिस्तान
के
खैबर-पख्तूनख्वा
प्रांत
में
स्थित
दारुल
उलूम
हक्कानिया
में
अध्ययन
किया,
जिसकी
स्थापना
दारुल
उलूम
देवबंद
की
तर्ज
पर
हुई
थी।
#WATCH | Saharanpur, Uttar Pradesh: On Afghanistan Foreign Minister Amir Khan Muttaqis visit to Darul Uloom Deoband in Saharanpur today, President of the Jamiat Ulama-i-Hind, Maulana Arshad Madani, says, “…We have a scholarly and educational connection with Afghanistan… He… pic.twitter.com/Vysd7TVaG3
— ANI (@ANI) October 11, 2025 “>
दारुल
उलूम
हक्कानिया
के
संस्थापक
मौलाना
अब्दुल
हक
ने
1947
से
पहले
देवबंद
के
मदरसे
में
अध्ययन
और
अध्यापन
किया
था।
उनके
बेटे
सामी-उल-हक
को
‘तालिबान
के
पिता’
के
रूप
में
जाना
जाता
है,
क्योंकि
इस
संस्था
ने
कई
तालिबान
कमांडरों
और
नेताओं
को
तैयार
करने
में
भूमिका
निभाई
थी।
देवबंद-अफगानिस्तान
पर
क्या
बोले
मुत्तकी?
मुत्तकी
ने
संवाददाताओं
से
बातचीत
में
देवबंद
की
अपनी
यात्रा
के
महत्व
पर
प्रकाश
डालते
हुए
कहा
कि
इसका
अफगानिस्तान
के
साथ
एक
लंबा
धार्मिक
और
ऐतिहासिक
संबंध
है।
उन्होंने
कहा,-
“देवबंद
हमारे
लिए
एक
महत्वपूर्ण
धार्मिक
स्थान
है।
इस
स्थान
और
इसके
लोगों
का
अफगानिस्तान
के
साथ
एक
लंबा
इतिहास
है।
जिस
तरह
हमारे
छात्र
यहां
इंजीनियरिंग
और
विज्ञान
का
अध्ययन
करने
आते
हैं,
उसी
तरह
वे
यहां
धार्मिक
अध्ययन
के
लिए
भी
आते
हैं।”
VIDEO | Saharanpur: On his Deoband visit, Afghanistan Foreign Minister Amir Khan Muttaqi says, “I am thankful for such a grand welcome and the affection shown by the people here. I hope that India-Afghanistan ties advance further. We will be sending new diplomats, and I hope you… pic.twitter.com/AwEakjDSAN
— Press Trust of India (@PTI_News) October 11, 2025 “>
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