International
oi-Siddharth Purohit
Davos
History:
विश्व
आर्थिक
मंच
यानी
World
Economic
Forum
(WEF)
एक
अंतर्राष्ट्रीय
संगठन
है,
जो
दुनिया
भर
के
बड़े
राजनीतिक
नेताओं,
बिज़नेस
लीडर्स,
नीति-निर्माताओं
और
नागरिक
समाज
के
प्रतिनिधियों
को
एक
मंच
पर
लाता
है।
यहां
वैश्विक
आर्थिक,
राजनीतिक
और
सामाजिक
मुद्दों
पर
खुलकर
चर्चा
होती
है।
यह
संगठन
खासतौर
पर
स्विट्ज़रलैंड
के
दावोस
में
होने
वाली
अपनी
सालाना
शीतकालीन
बैठक
के
लिए
जाना
जाता
है।
दावोस
क्यों
इतना
मशहूर
है?
दावोस
में
होने
वाली
सालाना
बैठक
इतनी
प्रसिद्ध
हो
चुकी
है
कि
“दावोस”
नाम
अब
सिर्फ
एक
जगह
नहीं,
बल्कि
इस
बैठक
और
इसमें
शामिल
राजनीतिक
और
बिजनेस
क्लास
का
पर्याय
बन
गया
है।
जब
भी
वैश्विक
ताकतवर
लोगों
की
बंद
कमरे
की
चर्चा
की
बात
होती
है,
दावोस
का
नाम
सबसे
पहले
आता
है।

छोटे
सम्मेलन
से
वैश्विक
मंच
तक
का
सफर
समय
के
साथ
WEF
एक
छोटे
यूरोपीय
प्रबंधन
सम्मेलन
से
बदलकर
वैश्वीकरण,
आर्थिक
विकास,
तकनीकी
बदलाव
और
अंतर्राष्ट्रीय
सहयोग
जैसे
विषयों
पर
चर्चा
करने
वाला
दुनिया
का
सबसे
प्रभावशाली
मंच
बन
गया।
इसकी
लोकप्रियता
और
असर
दोनों
लगातार
बढ़ते
चले
गए।
1971
में
हुई
थी
WEF
की
स्थापना
विश्व
आर्थिक
मंच
की
स्थापना
1971
में
क्लाउस
श्वाब
ने
की
थी।
वह
जर्मन
मूल
के
विद्वान
और
जिनेवा
विश्वविद्यालय
में
प्रोफेसर
थे।
उन्होंने
दावोस
में
एक
प्रबंधन
संगोष्ठी
आयोजित
की,
जिसमें
सैकड़ों
यूरोपीय
कॉर्पोरेट
लीडर्स
शामिल
हुए।
शुरुआती
मकसद
क्या
था?
इस
पहली
बैठक
का
उद्देश्य
यूरोपीय
कंपनियों
को
अमेरिकी
कंपनियों
के
मुकाबले
ज़्यादा
प्रतिस्पर्धी
बनाना
था।
बैठक
की
सफलता
से
प्रेरित
होकर
उसी
साल
क्लाउस
श्वाब
ने
‘यूरोपीय
प्रबंधन
मंच’
की
स्थापना
एक
गैर-लाभकारी
फाउंडेशन
के
रूप
में
की।
दावोस
को
ही
क्यों
चुना
गया?
दावोस
को
जानबूझकर
चुना
गया
था
क्योंकि
यह
एक
शांत
और
एकांत
अल्पाइन
रिसॉर्ट
है।
यहां
गोपनीयता
बनी
रहती
है,
जिससे
दिखावे
के
बजाय
साफ
और
गंभीर
बातचीत
संभव
हो
पाती
है।
मकसद
मीडिया
शोर
से
दूर
रहकर
खुले
संवाद
को
बढ़ावा
देना
था।
शुरुआती
दौर
में
किन
मुद्दों
पर
फोकस
था?
शुरुआती
वर्षों
में
मंच
का
फोकस
प्रबंधन
पद्धतियों
और
कॉर्पोरेट
गवर्नेंस
पर
था।
क्लाउस
श्वाब
का
मानना
था
कि
जिम्मेदार
बिज़नेस
लीडरशिप
ही
आर्थिक
स्थिरता
की
असली
कुंजी
है।
राजनीति
की
एंट्री
कब
हुई?
1970
के
दशक
के
मध्य
में
WEF
ने
सिर्फ
कॉर्पोरेट
मुद्दों
तक
सीमित
न
रहकर
राजनीति
की
ओर
भी
कदम
बढ़ाया।
राजनीतिक
नेताओं
को
आमंत्रित
किया
गया
और
अंतर्राष्ट्रीय
आर्थिक
नीति,
विकास
और
सामाजिक
मुद्दों
को
एजेंडे
में
शामिल
किया
गया।
सदस्यता
की
शुरुआत
1976
में
मंच
ने
“दुनिया
की
अग्रणी
कंपनियों”
के
लिए
औपचारिक
सदस्यता
प्रणाली
शुरू
की।
धीरे-धीरे
दावोस
बैठक
में
राष्ट्राध्यक्ष,
केंद्रीय
बैंक
गवर्नर,
वरिष्ठ
अधिकारी,
शिक्षाविद,
श्रमिक
संगठन
और
NGO
प्रतिनिधि
भी
शामिल
होने
लगे।
कब
बना
World
Economic
Forum?
1987
में
संगठन
का
नाम
बदलकर
‘विश्व
आर्थिक
मंच’
(World
Economic
Forum)
रख
दिया
गया।
1980
के
दशक
के
अंत
तक
दावोस
उन
वैश्विक
नेताओं
का
मिलन
स्थल
बन
गया,
जिन्हें
आम
तौर
पर
एक-दूसरे
से
मिलने
का
मौका
नहीं
मिलता
था।
दावोस
बैठक
कैसे
होती
है?
दावोस
की
सालाना
बैठक
में
हज़ारों
प्रतिभागी
शामिल
होते
हैं।
यहां
सार्वजनिक
सत्रों
के
साथ-साथ
निजी
बैठकों
और
बंद
दरवाज़ों
के
पीछे
होने
वाली
चर्चाएं
भी
होती
हैं।
विषयों
में
वैश्विक
अर्थव्यवस्था,
भू-राजनीति,
जलवायु
नीति,
सार्वजनिक
स्वास्थ्य
और
तकनीकी
बदलाव
शामिल
रहते
हैं।
क्या
यहां
फैसले
लिए
जाते
हैं?
WEF
की
बैठक
का
कोई
औपचारिक
निर्णय
लेने
का
अधिकार
नहीं
है।
यह
एक
चर्चा
मंच
है,
न
कि
सरकार।
हालांकि
2002
में
9/11
हमलों
के
बाद
एकजुटता
दिखाने
के
लिए
बैठक
को
अस्थायी
रूप
से
न्यूयॉर्क
शहर
में
आयोजित
किया
गया
था।
साल
भर
सक्रिय
रहता
है
WEF
विश्व
आर्थिक
मंच
सिर्फ
दावोस
तक
सीमित
नहीं
है।
यह
साल
भर
क्षेत्रीय
और
विषय
आधारित
बैठकें
करता
है
और
वैश्विक
अर्थव्यवस्था
व
दीर्घकालिक
जोखिमों
पर
रिपोर्ट
भी
जारी
करता
है।
WEF
का
पैसा
कहां
से
आता
है?
WEF
का
वित्तपोषण
मुख्य
रूप
से
कंपनियों
द्वारा
दी
जाने
वाली
सदस्यता
और
भागीदारी
फीस
से
होता
है।
यह
एक
निजी
संगठन
है
और
इसे
किसी
भी
तरह
का
सार्वजनिक
या
सरकारी
धन
नहीं
मिलता,
हालांकि
सरकारें
इसमें
भागीदार
होती
हैं।
शांति
वार्ताओं
में
भी
निभाई
भूमिका
हालांकि
WEF
के
पास
कोई
आधिकारिक
राजनयिक
ताकत
नहीं
है,
फिर
भी
इसने
कई
बार
राजनीतिक
प्रतिद्वंद्वियों
के
बीच
बातचीत
का
रास्ता
खोला
है।
1988
में
ग्रीस
और
तुर्की
के
बीच
हुआ
“युद्ध-नहीं”
समझौता
इसका
उदाहरण
है,
जिसे
दावोस
घोषणा
कहा
जाता
है।
ऐतिहासिक
मुलाकातों
का
गवाह
1989
में
उत्तर
और
दक्षिण
कोरिया
के
बीच
पहली
मंत्री-स्तरीय
बैठक
दावोस
में
हुई।
1992
में
नेल्सन
मंडेला
और
दक्षिण
अफ्रीका
के
राष्ट्रपति
एफ.डब्ल्यू.
डी.
क्लर्क
की
पहली
आमने-सामने
की
मुलाकात
भी
यहीं
हुई।
मध्य-पूर्व
शांति
प्रक्रिया
में
भूमिका
1994
में
यासिर
अराफात
और
शिमोन
पेरेस
के
बीच
हुई
चर्चाएं,
जो
आगे
चलकर
गाजा-जेरिको
समझौते
में
बदलीं,
उनमें
भी
दावोस
मंच
की
अहम
भूमिका
रही।
“दावोस
मैन”
और
आलोचनाएं
WEF
को
आलोचनाओं
का
सामना
भी
करना
पड़ा
है।
राजनीतिक
वैज्ञानिक
सैमुअल
पी.
हंटिंगटन
ने
“दावोस
मैन”
शब्द
गढ़ा,
जो
ऐसे
वैश्विक
अभिजात
वर्ग
को
दर्शाता
है
जो
राष्ट्रीय
हितों
से
ज़्यादा
वैश्विक
सोच
से
जुड़ा
माना
जाता
है।
इलिटिज्म
और
वैधता
पर
सवाल
आलोचकों
का
कहना
है
कि
WEF
अमीर
देशों
और
बड़ी
कंपनियों
को
ज़्यादा
तरजीह
देता
है।
यह
भी
सवाल
उठता
है
कि
एक
गैर-निर्वाचित
मंच
को
वैश्विक
एजेंडा
प्रभावित
करने
का
अधिकार
क्यों
होना
चाहिए।
क्लाउस
श्वाब
की
लंबी
पारी
और
नेतृत्व
संकट
क्लाउस
श्वाब
ने
1971
से
2025
तक
WEF
का
नेतृत्व
किया।
बाद
में
एक
आंतरिक
जांच
हुई,
जिसमें
उनके
खिलाफ
कोई
बड़ी
गड़बड़ी
नहीं
पाई
गई,
लेकिन
इसके
बाद
उन्होंने
इस्तीफा
दे
दिया।
जिसके
बाद
इसके
अंतरिम
अध्यक्ष
पीटर
ब्राबेक-लेटमाथे
ने
“जहरीले”
कार्य
वातावरण
का
हवाला
देते
हुए
इस्तीफा
दे
दिया।
इसके
बाद
संगठन
में
नेतृत्व
संकट
देखने
को
मिला।
पांच
दशक
बाद
भी
असर
कायम
पचास
से
अधिक
सालों
में
विश्व
आर्थिक
मंच
ने
वैश्विक
राजनीति
और
अर्थव्यवस्था
में
अपनी
एक
अलग
पहचान
बना
ली
है।
भले
ही
इसके
पास
कोई
औपचारिक
शक्ति
न
हो,
लेकिन
नेताओं
को
एक
मंच
पर
लाने
की
इसकी
क्षमता
ने
इसे
वैश्विक
बहसों
का
स्थायी
हिस्सा
बना
दिया
है।
क्यों
जाते
हैं
भारतीय
नेता?
इस
समिट
में
हर
बार
कुछ
भारतीय
नेता
भी
जाते
हैं।
इस
बार
केंद्रीय
मंत्री
अश्विनी
वैष्णव,
महाराष्ट्र
के
मुख्यमंत्री
देवेंद्र
फडणवीस,
गुजरात
के
गृहमंत्री
हर्ष
संघवी
और
यूपी
के
वित्त
मंत्री
सुरेश
खन्ना
समेत
कई
नेताओं
ने
अपनी
मौजूदगी
दर्ज
कराई
है।
दावोस
जाने
के
पीछे
भारतीय
नेताओं
का
मकसद
देश
और
राज्य
में
किसी
तरह
इन्वेस्टमेंट
लाना
होता
है।
जिसमें
वह
इन्वेस्टर्स
को
उनके
अनुकूल
माहौल
बनाकर
भारत
में
निवेश
करने
के
लिए
प्रस्ताव
देते
हैं।
दावोस
2026
का
क्या
है
फोकस?
साल
2026
में
दावोस
बैठक
का
केंद्रीय
विषय
होगा
–
“संवाद
की
भावना
को
बढ़ावा
देना”।
आज
की
दुनिया
जटिल
होती
जा
रही
है,
समाज
में
विभाजन
बढ़
रहा
है
और
तकनीकी
नवाचार
बहुत
तेज़ी
से
आगे
बढ़
रहा
है।
ऐसे
माहौल
में
अलग-अलग
विचारों
को
सुनना,
खुलकर
बहस
करना
और
आपसी
भरोसा
बनाना
पहले
से
ज्यादा
ज़रूरी
हो
गया
है।
इस
खबर
पर
आपकी
क्या
राय
है,
हमें
कमेंट
में
बताएं।

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