World News

Russia: भारत पर मंडराया बड़ा खतरा, इंडियन एंबेसी के पास ISI ने खोला खूफिया दफ्तर, पुतिन नें क्यों नहीं रोका? | Moscow: Pakistan-turkiye-spy-office-matryoshka-desk-in-moscow-embassy-world-news-hindi

International

oi-Siddharth Purohit

Moscow: भारत में अस्थिरता और आतंकवादी घटनाओं का एक ही कारण है, पाकिस्तान। पाकिस्तान कभी बॉर्डर के जरिए आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिलवाता है, कभी बांग्लादेश के रास्ते तो कभी नेपाल के रास्ते। नेपाल में पाकिस्तानी जासूसों का होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब भारत के सामने जो खतरा उभर रहा है, वह सोच से भी ज्यादा बड़ा हो रहा है। दरअसल पाकिस्तान की खूफिया एजेंसी ISI औऱ तुर्किए की खूफिया एजेंसी MIT ने रूस की राजधानी मॉस्को में अपने सीक्रेट दफ्तर खोल लिए हैं।

कहां खोले ISI और MIT ने दफ्तर?

रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया है कि तुर्किए की एमआईटी (MIT) और पाकिस्तान की ISI (ISI) रूस की धरती पर गुप्त जासूसी अभियान चला रही हैं। कहा जा रहा है कि ये गतिविधियां किसी अलग जगह से नहीं बल्कि दूतावास से चलाने की बात सामने आई है।

Moscow

रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्किए और पाकिस्तान ने रूस में अपनी एम्बेसी के भीतर खुफिया यूनिट बना रखी हैं। अगर ये आरोप सच साबित होते हैं, तो यह हाल के सालों में रूस में सबसे गंभीर खुफिया टकरावों में से एक होगा। इसका असर जियो पॉलिटिक्स पर भी पड़ सकता है।

पाकिस्तान की ‘मात्र्योश्का डेस्क’ और तुर्किए का जासूस दफ्तर

सूत्रों के मुताबिक, तुर्किए ने मॉस्को स्थित अपने दूतावास में एक गुप्त खुफिया सेल गठित किया है। वहीं पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) ने मॉस्को के सादोवाया-ट्रायुमफालनया स्ट्रीट 4/10 पर स्थित अपनी एडीपी विंग में ‘मात्र्योश्का (Matryoshka) डेस्क’ नाम की स्पेशल यूनिट बनाई है।

कहा जा रहा है कि तुर्किए का ऑपरेशन कानून प्रवर्तन सहयोग के नाम पर जानकारी जुटाने पर केंद्रित है। लेकिन ISI की यूनिट के उद्देश्य ज्यादा संवेदनशील बताए जा रहे हैं, जिनमें रूसी खुफिया तंत्र में घुसपैठ और विदेशों में रूसी संपत्तियों से जुड़ी जानकारी जुटाना शामिल है।

जनवरी 2026 में हुई शुरू हुआ खेल

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ISI का ‘मात्र्योश्का डेस्क’ जनवरी 2026 में बनाई गई। यह कदम पाक सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के वाशिंगटन दौरे के बाद उठाया गया। उस दौरे में सीआईए (CIA) से जुड़े अधिकारियों से भी मुलाकात शामिल थी। बताया जाता है कि इस यूनिट को व्यापक लॉजिस्टिक सपोर्ट और रणनीतिक स्वतंत्रता देने का वादा किया गया।

भारतीय दूतावास के बेहद करीब पाक का खूफिया दफ्तर

ISI का ये खूफिया दफ्तर (Spy Unit) भारतीय दूतावास से काफी करीब है। इंडियन एंबेसी से इसकी दूरी मात्र 6 किलोमीटर है जिसे मात्र 12 से 14 मिनट में तय किया जा सकता है। ये बात इस मामले को और गंभीर बना देती है।

Moscow

भारत को कितना खतरा?

भारत के लिए ये बाद बेहद खतरनाक है कि हमारे सबसे भरोसेमंद साथी और करीबी मित्र देश के साथ ऐसा हो रहा है। अगर ISI-MIT का ये खेल जल्द नहीं पकड़ा जाता है तो रूस में रह रहे हमारे डिप्लोमेंट के लिए गंभीर खतरा हो सकता है। रूस में भारत के संसाधनों को चोट पहुंचाई जा सकती है। यही नहीं, रक्षा सौदों की जानकारी भी लीक कराना पाकिस्तान के लिए आसान हो सकता है। इसलिए अगर पाक-तुर्किए के ये जासूसी दफ्तर जब तक वहां खुले हैं तब तक भारत के लिए ये एक बड़ी चिंता का विषय है।

पुतिन पर ही साधा निशाना

ब्रिगेडियर मुहम्मद आसिफ खान और दो अन्य अधिकारियों की निगरानी में इस यूनिट के कई लक्ष्य बताए जा रहे हैं। इनमें रूसी खुफिया हलकों में घुसपैठ, अमेरिका में रूसी ‘संपत्तियों’ की पहचान, और रूसी सैन्य वर्ग के साथ-साथ ऑफीसर क्लास से जुड़े लोगों की भर्ती शामिल है।

कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा है कि अस्थिरता फैलाने वाली रणनीतियां राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को निशाना बना सकती हैं। सबसे गंभीर आरोप यह है कि ISI से जुड़े लोग, जिनके कथित तौर पर चरमपंथी नेटवर्क से संबंध रहे हैं, रूस के भीतर भर्ती और कट्टरपंथी अभियानों में सक्रिय हो सकते हैं।

लोकल सोसाइटी में घुलने-मिलने की क्षमता

कहा जा रहा है कि ये कथित एजेंट रूसी भाषा में पारंगत हैं और स्थानीय समाज में आसानी से घुलमिल सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह सही है, तो यह सिर्फ जासूसी नहीं बल्कि रूस की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है।

1971 से शुरू हुई कड़वाहट

इन आरोपों को समझने के लिए दक्षिण एशिया का इतिहास जानना जरूरी है। 1971 में भारत और तत्कालीन सोवियत संघ के समर्थन से बांग्लादेश की आजादी हुई थी। उस युद्ध में पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा था। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस हार ने पाकिस्तान की सैन्य सोच पर गहरा असर डाला। इसके बाद ज़ुल्फिकार अली भुट्टो और जनरल ज़िया-उल-हक के दौर में पाकिस्तान ने न्यूक्लियर प्रोग्राम और गुप्त खुफिया नेटवर्क को मजबूत किया।

अफगान युद्ध और ISI की ताकत

1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में प्रवेश के बाद पाकिस्तान को रणनीतिक मौका मिला। सीआईए के साथ मिलकर ISI ने अफगान मुजाहिदीन को हथियार, फंडिंग और ट्रेनिंग दी। एक दशक से ज्यादा समय तक चले इस अभियान ने ISI को एक मजबूत गुप्त युद्ध मशीन में बदल दिया। सोवियत वापसी के बाद इसी ढांचे के कुछ हिस्से कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हुए।

राष्ट्रपति पुतिन का पुराना डर

पिछले साल नवंबर में रूसी अधिकारियों ने कथित तौर पर ISI से जुड़े एक नेटवर्क का खुलासा किया था, जो एमआई-8एएमटीएसएचवी सैन्य हेलीकॉप्टर प्लेटफॉर्म से जुड़ी तकनीक की तस्करी करने की कोशिश कर रहा था।
वहीं 2011 में विकीलीक्स द्वारा लीक दस्तावेजों में ISI के कुछ तत्वों के अल-कायदा और तालिबान से संबंधों का जिक्र किया गया था। उस समय अमेरिकी अधिकारियों, जिनमें एडमिरल माइक मुलेन भी शामिल थे, ने ISI की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

पाक की साजिश में तुर्किए शामिल?

नॉर्डिक मॉनिटर के संपादक अब्दुल्ला बोरकुट की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि तुर्किए के मॉस्को दूतावास में एक गुप्त खुफिया सेल काम कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि यह ऑपरेशन कथित तौर पर तुर्किए की नेशनल इंटेलिजेंस ऑर्गेनाइजेशन (MIT) नहीं बल्कि आंतरिक मंत्रालय के सुरक्षा निदेशालय जनरल (एमनियेत) द्वारा चलाया जा रहा है। लीक दस्तावेजों के मुताबिक, ‘इंटरनल मिनिस्ट्री के काउंसलर’ के नाम पर तैनात अधिकारी रूस से जुटाई गई जानकारी अंकारा भेज रहे थे।

एर्दोगन के आलोचकों पर नजर

कहा जाता है कि यह खुफिया जानकारी उन लोगों पर थी जिन्हें राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन का आलोचक माना जाता है, खासकर 2016 के असफल तख्तापलट के बाद। तुर्किए जेंडरमेरी जनरल कमांड के मेजर जनरल एमरुल्लाह ब्यूक पर इस सेल की निगरानी का आरोप है। 1990 के दशक में जेंडरमेरी की खुफिया यूनिट JITEM पर दक्षिणपूर्वी तुर्किए में विवादास्पद कार्रवाइयों के आरोप लगे थे।

मॉस्को बना नया खुफिया शतरंज बोर्ड

रूस इस समय पश्चिम के साथ तनाव, यूक्रेन संघर्ष और बदलते गठबंधनों के बीच संतुलन बना रहा है। ऐसे माहौल में विदेशी खुफिया एजेंसियों के लिए मौके भी बनते हैं। ISI का सीआईए से तालमेल और साथ ही रूस में कथित ऑपरेशन, वैश्विक राजनीति के जटिल समीकरणों को दिखाता है। तुर्किए भी 2016 के बाद से विदेशों में अपनी खुफिया पहुंच बढ़ा रहा है। वह डिप्लोमैटिक मिशनों और पाकिस्तान से रूस जाने वाले लोगों के नेटवर्क का उपयोग कर रहा है।

रणनीतिक जोखिम और संभावित असर

रूस की FSB और SVR जैसी एजेंसियां दुनिया की मजबूत एंटी-स्पाय (Anti Spy) सर्विसों में गिनी जाती हैं। अगर राजनयिक दफ्तरों का इस्तेमाल होने की पुष्टि होती है, तो इन दोनों देशों के राजदूत निकाले जा सकती है, जवाबी कार्रवाई हो सकती है। हाइब्रिड वॉर, साइबर ऑपरेशन और प्रॉक्सी संघर्षों के दौर में जासूसी और अस्थिरता के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही है।

विश्लेषकों का मानना है कि अगर आरोप सही हैं, तो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अलग-थलग पड़ना पड़ सकता है। तुर्किए को भी नाटो देशों के भीतर सवालों का सामना करना पड़ सकता है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

What's your reaction?

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts