International
oi-Sumit Jha
India
Pakistan
UNSC
Debate:
पाकिस्तान
एक
बार
फिर
संयुक्त
राष्ट्र
(UN)
के
मंच
का
इस्तेमाल
भारत
के
खिलाफ
दुष्प्रचार
फैलाने
और
जम्मू-कश्मीर
का
झूठा
‘राग’
अलापने
के
लिए
कर
रहा
था,
लेकिन
भारत
ने
उसे
करारा
जवाब
दिया।
भारत
ने
संयुक्त
राष्ट्र
सुरक्षा
परिषद
(UNSC)
में
पाकिस्तान
के
दोहरे
रवैये
को
दुनिया
के
सामने
उजागर
किया।
संयुक्त
राष्ट्र
सुरक्षा
परिषद
(UNSC)
में
बहस
के
दौरान,
भारत
ने
पाकिस्तान
की
भारत
के
खिलाफ
की
जा
रही
झूठी
आलोचना
पर
कड़ा
रुख
अपनाया।
यूएन
में
भारत
के
स्थायी
प्रतिनिधि
पार्वथानेनी
हरीश
ने
पाकिस्तान
को
‘आड़े-हाथों’
लिया
और
कहा
कि
यह
दुर्भाग्यपूर्ण
है
कि
हर
साल
भारत
को
पाकिस्तान
की
बेबुनियाद
बातें
सुननी
पड़ती
हैं।
पाकिस्तान
बार-बार
जम्मू-कश्मीर
का
मुद्दा
उठाकर
दुनिया
का
ध्यान
भटकाने
की
कोशिश
करता
है,
लेकिन
वह
इस
तथ्य
को
नहीं
बताता
कि
उसने
भारत
के
इलाके
पर
अवैध
रूप
से
कब्जा
जमा
रखा
है,
जिसे
पाकिस्तान
अधिकृत
कश्मीर
(PoK)
कहा
जाता
है।

पाकिस्तान
के
नरसंहार
और
अत्याचारों
का
खुलासा
भारत
ने
दुनिया
के
सामने
पाकिस्तान
की
उस
‘हकीकत’
को
रखा
जिसमें
वह
खुद
के
लोगों
पर
हमले
करता
है
और
बड़े
पैमाने
पर
नरसंहार
करता
है।
भारत
ने
याद
दिलाया
कि
पाकिस्तान
की
सेना
ने
1971
में
कुख्यात
‘ऑपरेशन
सर्चलाइट’
चलाया
था,
जिसके
तहत
4
लाख
महिलाओं
के
साथ
सामूहिक
दुष्कर्म
किया
गया
और
उनकी
हत्या
कर
दी
गई।
भारत
ने
कहा
कि
यह
वही
देश
है
जो
ऐसे
जघन्य
कृत्य
करने
के
बावजूद
दुनिया
को
गुमराह
करने
की
कोशिश
करता
है।
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कार्रवाई
पर
हुई
थू-थू
महिला,
शांति
और
सुरक्षा
पर
भारत
का
बेदाग
रिकॉर्ड
बहस
महिलाओं
को
लेकर
हो
रही
थी,
जिस
पर
पाकिस्तान
ने
भारत
के
खिलाफ
बेबुनियाद
आरोप
लगाने
की
कोशिश
की।
इसके
जवाब
में,
भारत
के
स्थायी
प्रतिनिधि
ने
स्पष्ट
किया
कि
महिला,
शांति
और
सुरक्षा
के
एजेंडे
पर
भारत
का
रिकॉर्ड
बेदाग
रहा
है।
उन्होंने
शांति
सेना
में
महिला
सैनिकों
को
बढ़ावा
देने
में
भारत
के
नेतृत्व
का
उदाहरण
दिया
और
भारतीय
पुलिस
सेवा
की
पहली
महिला
अधिकारी
डॉ.
किरण
बेदी
का
उल्लेख
किया।
डॉ.
किरण
बेदी
2003
में
संयुक्त
राष्ट्र
पुलिस
प्रभाग
की
प्रमुख
और
पहली
महिला
पुलिस
सलाहकार
बनी
थीं।
भारत
ने
अपने
वक्तव्य
को
समाप्त
करते
हुए
एक
महत्वपूर्ण
सवाल
उठाया:
“क्या
महिलाओं
के
बिना
शांति
स्थापना
संभव
है?”
भारत
ने
कहा
कि
महिलाओं
की
भागीदारी
लैंगिक
हिंसा
से
निपटने
में
मदद
करती
है
और
यह
सुनिश्चित
करती
है
कि
शांति
प्रक्रियाएं
समाज
के
सभी
वर्गों
के
दृष्टिकोणों
को
दर्शाएं।
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