International
oi-Divyansh Rastogi
Asim
Munir
News:
पाकिस्तान
की
शहबाज
शरीफ
(Shahbaz
Sharif)
सरकार
ने
एक
बार
फिर
अपने
सेना
प्रमुख
फील्ड
मार्शल
असीम
मुनीर
को
सत्ता
के
नए
शिखर
पर
पहुंचाने
का
फैसला
किया
है।
8
नवंबर
को
संसद
में
पेश
27वें
संवैधानिक
संशोधन
विधेयक
के
जरिए
‘रक्षा
बलों
के
प्रमुख’
(चीफ
ऑफ
डिफेंस
फोर्सेस
–
सीडीएफ)
नामक
एक
नया,
अत्यंत
शक्तिशाली
पद
सृजित
कर
दिया
गया,
जो
सीधे
मुनीर
के
लिए
ही
रचा
गया
प्रतीत
होता
है।
यह
पदोन्नति
मई
2025
में
भारत
के
साथ
हुए
चार
दिवसीय
संघर्ष
के
बाद
मिले
फील्ड
मार्शल
के
सम्मान
के
ठीक
छह
महीने
बाद
आ
रही
है।
लेकिन
सवाल
उठता
है,
आतंकवाद
के
कथित
संरक्षक
मुनीर
को
यह
‘दुहरी
मेहरबानी’
क्यों?
क्या
मई
का
संघर्ष
ही
वह
‘कारनामा’
है,
या
फिर
पाकिस्तान
की
आंतरिक
अस्थिरता
और
सैन्य
तानाशाही
को
मजबूत
करने
की
साजिश?

अंतरराष्ट्रीय
स्तर
पर
मुनीर
को
‘ओसामा
बिन
लादेन
इन
सूट’
कहा
जा
चुका
है,
और
अब
यह
प्रमोशन
उसके
‘दोहरे
चेहरे’-
एक
तरफ
आतंक
के
प्रायोजक,
दूसरी
तरफ
‘क्षेत्रीय
स्थिरता’
के
हामी-
को
और
उजागर
कर
रहा
है।
संवैधानिक
संशोधन:
मुनीर
की
कमान
को
‘संवैधानिक
छतरी’,
लेकिन
लोकतंत्र
पर
साये
कानून
मंत्री
आजम
नजीर
तारड़
ने
कैबिनेट
की
मंजूरी
के
बाद
सीनेट
में
पेश
किए
गए
इस
विधेयक
में
संविधान
के
अनुच्छेद
243
में
व्यापक
बदलाव
प्रस्तावित
हैं,
जो
सशस्त्र
बलों
की
कमान
संरचना
को
पूरी
तरह
पुनर्गठित
कर
देते
हैं।
मुख्य
प्रावधान
इस
प्रकार
हैं:-
| प्रावधान | विवरण | प्रभाव |
|---|---|---|
| नया पद सृजित (सीडीएफ) | थल, वायु और नौसेना के बीच एकीकृत कमान सुनिश्चित करने वाला पद। थल सेनाध्यक्ष (सीओएएस) ही इसका प्रमुख होगा। | मुनीर (वर्तमान सीओएएस) को स्वतः यह पद मिलेगा, जो तीनों सेनाओं पर उनकी प्रत्यक्ष कमान स्थापित करेगा। |
| राष्ट्रीय सामरिक कमान (एनएससी) | सीडीएफ प्रधानमंत्री के परामर्श से एनएससी प्रमुख की नियुक्ति करेगा, जो हमेशा पाकिस्तानी सेना से होगा। | परमाणु हथियारों और सामरिक संपत्तियों पर मुनीर की पकड़ मजबूत होगी, जो क्षेत्रीय तनावों में खतरनाक साबित हो सकता है। |
| पुराने पद का अंत | जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीजेएससी) अध्यक्ष का पद 27 नवंबर 2025 को समाप्त। वर्तमान अध्यक्ष जनरल साहिर शमशाद मिर्जा का कार्यकाल यहीं खत्म। | मुनीर की कमान सीधे शीर्ष पर आ जाएगी, जो सैन्य एकाधिकार को बढ़ावा देगा। |
| उच्च पदोन्नति का अधिकार | सरकार को फील्ड मार्शल, एयर चीफ मार्शल और एडमिरल ऑफ द फ्लीट जैसे पदों पर प्रमोशन का अधिकार। फील्ड मार्शल आजीवन। | मुनीर के लिए स्थायी विशेषाधिकार, जो उन्हें ‘राजनीतिक रूप से अछूत’ बना देगा। |
सरकार
का
दावा
है
कि
ये
बदलाव
मई
2025
के
भारत-पाकिस्तान
संघर्ष
से
‘सबक’
पर
आधारित
हैं,
जहां
आधुनिक
युद्ध
ने
एकीकृत
प्रतिक्रिया
की
मांग
की।
लेकिन
विपक्षी
दल
जैसे
पीटीआई
और
विश्लेषक
इसे
सैन्य
तानाशाही
का
नया
अध्याय
मानते
हैं।
पीटीआई
नेता
हामिद
खान
ने
इसे
‘संविधान
की
हत्या’
कहा,
जबकि
पूर्व
अमेरिकी
राजदूत
जाल्माय
खलीलजाद
ने
मुनीर
को
‘अविश्वसनीय’
करार
दिया।
सीनेट
की
समितियां
इसे
जांच
रही
हैं,
लेकिन
सरकार
का
बहुमत
इसे
पारित
कराने
में
सक्षम
है।
India
Pakistan
Tension:
मई
2025
का
संघर्ष,
‘कारनामा’
या
हार
का
इनाम?
मुनीर
की
पदोन्नति
का
आधार
मई
का
संघर्ष
है,
लेकिन
यह
‘रणनीतिक
जीत’
कम,
‘रक्षात्मक
झुकाव’
ज्यादा
लगता
है।
22
अप्रैल
2025
को
जम्मू-कश्मीर
के
पहलगाम
(बैसरन
घाटी)
में
लश्कर-ए-तैयबा
(LeT)
की
सहयोगी
‘द
रेसिस्टेंस
फ्रंट’
(TRF)
ने
26
निर्दोष
पर्यटकों
(ज्यादातर
हिंदू
पुरुष)
की
हत्या
की।
हमलावरों
ने
पीड़ितों
के
सिर
पर
गोली
मारकर
पत्नियों
के
माथे
पर
‘सिंदूर’
मिटाने
जैसा
क्रूर
संदेश
दिया।
भारत
ने
जवाब
में
7
मई
को
‘ऑपरेशन
सिंदूर’
शुरू
किया:-
-
भारतीय
हमले:
पाकिस्तान
और
PoK
में
LeT
व
जैश-ए-मोहम्मद
के
9
ठिकानों
पर
मिसाइल-ड्रोन
हमले।
100+
आतंकी
मारे
गए। -
पाकिस्तानी
जवाब:
‘ऑपरेशन
बुनयान-उम-मरसूस’
में
ड्रोन-मिसाइल
से
भारत
के
15
स्थानों
पर
हमले।
लेकिन
10
मई
को
पाक
डीजीएमओ
ने
भारतीय
समकक्ष
को
फोन
कर
युद्धविराम
की
गुहार
लगाई। -
नुकसान:
भारतीय
वायुसेना
प्रमुख
एपी
सिंह
के
अनुसार,
12
पाकिस्तानी
विमान
(F-16
सहित)
नष्ट/क्षतिग्रस्त।
हवाई
अड्डे,
रडार,
कमांड
सेंटर
और
SAM
सिस्टम
तबाह।
संघर्ष
खत्म
होने
के
10
दिन
बाद,
20
मई
को
मुनीर
को
फील्ड
मार्शल
बनाया
गया-पाकिस्तान
के
इतिहास
में
दूसरा
(1959
में
अयूब
खान
के
बाद)।
शरीफ
सरकार
ने
इसे
‘राष्ट्रीय
सुरक्षा
का
इनाम’
बताया,
लेकिन
पूर्व
अमेरिकी
पेंटागन
अधिकारी
माइकल
रुबिन
ने
मुनीर
को
‘ओसामा
बिन
लादेन
इन
सूट’
कहा,
जो
पहलगाम
हमले
को
‘ग्रीन
सिग्नल’
देने
का
दोषी
है।
पाकिस्तानी
मीडिया
ने
इसे
‘रणनीतिक
जीत’
कहा,
लेकिन
भारत
का
कहना
है
कि
पाकिस्तान
ने
ही
हार
मान
ली।
Asim
Munir
Double
Face:
आतंक
के
प्रायोजक
या
‘Zero
Tolerance’
के
योद्धा?
मुनीर
का
प्रमोशन
उनके
विवादास्पद
इतिहास
को
नजरअंदाज
करता
है।
पूर्व
आईएसआई
प्रमुख
के
रूप
में,
वे
आतंक
नेटवर्क्स
के
कथित
संरक्षक
रहे।
पहलगाम
हमले
से
ठीक
पहले
उनके
भाषण
में
‘कश्मीर
पाकिस्तान
की
जुगुलर
वेन’
कहना
हमले
को
भड़काने
वाला
माना
गया।
जैश
कमांडर
मसूद
इलियास
कश्मीरी
ने
दावा
किया
कि
मुनीर
ने
ऑपरेशन
सिंदूर
में
मारे
आतंकियों
के
अंतिम
संस्कार
में
सेना
के
जनरलों
को
भेजा।
-
आतंक
लिंक्स:
अमेरिकी
विशेषज्ञों
ने
पाकिस्तान
को
‘राज्य
प्रायोजित
आतंक’
कहा,
मुनीर
को
जिम्मेदार
ठहराते
हुए।
टीटीपी
ने
उन्हें
‘मर्द
हो
तो
आमने-सामने
लड़ो’
चुनौती
दी।
प्रो-अफगान
तालिबान
साइट्स
ने
पाकिस्तान
को
‘आतंक
का
संरक्षण
और
अराजकता
का
प्रायोजक’
कहा। -
आंतरिक
दमन:
इमरान
खान
की
गिरफ्तारी
और
पीटीआई
पर
क्रैकडाउन
में
मुनीर
की
भूमिका।
सैनिकों
में
असंतोष:
3,000+
सैनिक
मारे
गए,
लेकिन
टीटीपी
भर्ती
बढ़ी।
एक्स
पर
पूर्व
अधिकारी
अदील
राजा
ने
उन्हें
‘पाकिस्तान
के
लिए
खतरा’
कहा। - पाखंड,
‘डिजिटल
आतंकवाद’
का
रोना
रोते
हुए
आलोचना
दबाना,
लेकिन
कश्मीर
में
‘जायज
संघर्ष’
का
समर्थन।
न्यूयॉर्क
टाइम्स
पर
‘आतंक
सफेदी’
का
आरोप।
हालांकि,
मुनीर
को
‘मुस्लिम
500’
में
‘प्रभावशाली
मुस्लिम’
चुना
गया,
जो
उनकी
‘शून्य
सहिष्णुता’
नीति
की
प्रशंसा
करता
है।
लेकिन
यह
दोहरा
चेहरा
पाकिस्तान
की
अस्थिरता
को
बढ़ा
रहा
है।
क्षेत्रीय
तनाव
और
आंतरिक
संकट:
प्रमोशन
की
असल
रणनीति
यह
कदम
पाकिस्तान
की
दोहरी
चुनौतियों
का
प्रतिबिंब
है।
घरेलू
स्तर
पर,
आर्थिक
संकट
(मुद्रास्फीति
0.3%
पर,
लेकिन
विदेशी
भंडार
$10
अरब
के
आसपास)
और
पीटीआई
दमन
के
बीच
सेना
की
साख
बचाने
की
कोशिश।
बाहरी
मोर्चे
पर,
भारत
के
साथ
तनाव
(ऑपरेशन
सिंदूर
ने
पाक
को
रक्षात्मक
बनाया)
और
अफगानिस्तान
से
सीमा
आतंक
ने
मजबूत
सैन्य
ढांचे
की
मांग
की।
विश्लेषक
कहते
हैं,
यह
मुनीर
को
‘राजनीतिक
अछूत’
बनाता
है,
लेकिन
लोकतंत्र
को
कुचलता
है।
भारतीय
रक्षा
मंत्री
राजनाथ
सिंह
ने
व्यंग्य
किया:
‘प्रमोशन
तो
उन्होंने
खुद
ले
लिया।’
एक
वरिष्ठ
भारतीय
अधिकारी
ने
कहा,
‘पाकिस्तान
सीखने
के
बजाय
सेना
को
ताकतवर
बना
रहा
है।’
अंतरराष्ट्रीय
स्तर
पर,
अमेरिका
ने
चेतावनी
दी
कि
पाक
‘डबल
गेम’
खेल
रहा
है।
क्या
यह
प्रमोशन
पाकिस्तान
को
स्थिरता
देगा?
या
मुनीर
का
दोहरा
चेहरा-आतंक
का
संरक्षक
और
‘शांति
का
हामी’-देश
को
और
गहरी
अस्थिरता
में
धकेलेगा?
समय
बताएगा,
लेकिन
इतिहास
सैन्य
एकाधिकार
के
खतरों
की
गवाही
देता
है।
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फिर
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