International
oi-Siddharth Purohit
Bihar
Exit
Poll
2025:
बिहार
चुनाव
के
दो
साल
पहले
से
तैयारी
कर
रहे
प्रशांत
किशोर
उर्फ
पीके
की
पार्टी
जन
सुराज
की
एग्जिट
पोल
में
हालत
खराब
है।
लगभग
सभी
एग्जिट
पोल
ने
पीके
भैया
की
पार्टी
को
0-2
या
03
और
ज्यादा
से
ज्यादा
0-5
सीटें
दी
हैं।
लेकिन
ऐसा
क्यों
हुआ
जानेंगे
उसकी
वजह।
पीके
उर्फ
‘टू-टू’
भाई
प्रशांत
किशोर
हमेशा
जोखिम
लेने
के
लिए
तैयार
रहते
हैं।
नरेंद्र
मोदी
के
पहले
लोकसभा
चुनाव
में
जो
टीम
उनकी
स्ट्रेटजी
बना
रही
थी
उसकी
कमान
पीके
उर्फ
टू-टू
भाई
के
हाथ
में
ही
थी।
उसके
बाद
जब
JD(U)-RJD
गठबंधन
को
मजबूत
करने
में
किशोर
की
भूमिका
ने
भाजपा
को
बिहार
की
सत्ता
से
बाहर
रखा,
तो
बिहार
को
समझ
आया
कि
कुछ
तो
बात
है
लड़के
में।
इसके
बाद
प्रशांत
जेडीयू
में
गए
और
फिर
कुछ
ही
दिनों
में
जेडीयू
से
बाहर
कर
दिए
गए।
फिर
बाद
में
अलग
दल
बनाकर
जमीन
पर
उतरे।

क्या
पहली
राजनीतिक
हार
होगी?
बिहार
में
ज़मीनी
स्तर
पर
तीन
साल
के
राजनीतिक
काम
के
बावजूद,
प्रशांत
किशोर
का
बहुचर्चित
जन
सुराज
आंदोलन
इस
बार
के
विधानसभा
चुनावों
में
उम्मीदों
पर
खरा
नहीं
उतर
पाया
है।
ज़्यादातर
एग्जिट
पोल
बताते
हैं
कि
इस
नए
राजनीतिक
संगठन
को
बहुत
सीमित
सफलता
मिल
सकती
है।
विश्लेषकों
के
अनुसार,
यह
किशोर
की
सक्रिय
राजनीति
में
पहली
बड़ी
चुनावी
हार
के
रूप
में
देखा
जा
रहा
है।
शून्य
से
पांच
तक
का
सफर
कई
सर्वे
एजेंसियों
के
एग्जिट
पोल
के
नतीजे
बताते
हैं
कि
जन
सुराज
को
सिंगल
डिजिट
(एक
अंक)
में
सीटें
मिल
सकती
हैं।
•
पी-मार्क
एजेंसी
ने
पार्टी
को
एक
से
चार
सीटों
के
बीच
अनुमानित
किया
है।
•
पीपल्स
पल्स
का
अनुमान
शून्य
से
पाँच
सीटों
के
बीच
है।
•
एक
अन्य
एजेंसी
ने
जन
सुराज
के
लिए
अधिकतम
पाँच
सीटों
की
भविष्यवाणी
की
है।
•
वहीं,
दैनिक
भास्कर
एग्जिट
पोल
के
अनुसार,
पार्टी
को
एक
भी
सीट
मिलने
की
संभावना
नहीं
है।
•
पीपल्स
इनसाइट
ने
इसे
दो
सीटों
तक
सीमित
बताया
है।
इन
तमाम
अनुमानों
से
साफ
है
कि
प्रशांत
किशोर
का
राजनीतिक
डेब्यू
अपेक्षित
स्तर
पर
प्रदर्शन
नहीं
कर
पाया
है।
जन
सुराज
अभियान
में
क्या
कमी
रही?
सामूहिक
रूप
से
देखा
जाए
तो
ये
आंकड़े
बताते
हैं
कि
2022
में
बड़े
उत्साह
से
शुरू
किया
गया
जन
सुराज
अभियान
अपनी
शुरुआती
उम्मीदों
से
काफी
पीछे
रह
गया
है।
मैट्रिक्स
सर्वेक्षण
के
अनुसार,
•
एनडीए
गठबंधन
को
147
से
167
सीटें,
•
जबकि
महागठबंधन
को
70
से
90
सीटें
मिलने
की
संभावना
है।
ये
आंकड़े
बताते
हैं
कि
बिहार
की
राजनीति
में
अभी
भी
स्थापित
दलों-
भाजपा,
RJD
और
JDU
का
दबदबा
है,
और
नए
दलों
के
लिए
जगह
बनाना
कठिन
साबित
हो
रहा
है।
‘सिंहासन
या
ज़मीन’
वाला
बयान
हुआ
सच
अपने
चुनावी
अभियान
के
दौरान,
प्रशांत
किशोर
ने
कहा
था
कि
यह
चुनाव
तय
करेगा
कि
वह
“सिंहासन
पर
बैठते
हैं
या
ज़मीन
पर
आते
हैं।”
अब
एग्जिट
पोल
के
रुझान
उनकी
इस
भविष्यवाणी
के
दूसरे
हिस्से
की
ओर
इशारा
करते
दिख
रहे
हैं।
राजनीतिक
विश्लेषकों
का
मानना
है
कि
राज्य
में
मतदाताओं
का
ध्रुवीकरण
किशोर
के
खिलाफ
गया,
जिससे
जन
सुराज
की
संभावनाएं
सीमित
हो
गईं।
3
संयोग
बने
गिरावट
की
वजह
राजनीतिक
विश्लेषकों
की
मानें
तो
2
वजहें
ऐसी
रही
जो
पीके
के
पक्ष
में
नहीं
गईं।
1.
जब
चुनावी
माहौल
ध्रुवीकृत
हो
जाता
है,
तो
मतदाता
प्रायः
भाजपा,
RJD
या
JDU
जैसे
स्थापित
दलों
के
साथ
एकजुट
हो
जाते
हैं।
ऐसे
परिदृश्य
में
नए
राजनीतिक
प्रयोगों
की
संभावनाएं
घट
जाती
हैं।
2.
कई
विश्लेषकों
का
मानना
है
कि
यदि
यह
चुनाव
ज्यादा
टकराव
वाला
या
प्रतिस्पर्धी
होता,
तो
जन
सुराज
बेहतर
प्रदर्शन
कर
सकता
था
और
निर्णायक
वोट
शेयर
हासिल
कर
पाता।
लेकिन
ऐसा
हुआ
नहीं।
3.
बिहार
में
अगर
BPSC
का
आंदोलन
छोड़
दें
तो
ऐसा
कोई
आंदोलन
नहीं
हुआ
जो
पीके
के
लिए
सहारा
बन
पाता।
और
अगर
आंदोलन
हो
भी
जाता
तो
दिल्ली
में
आंदोलन
से
निकली
पार्टी
के
असफल
कार्यकाल
की
वजह
भी
आंदोलन
पर
शक
की
वजह
बन
सकता
था।
अभियान
की
शुरुआत
और
मुद्दे
प्रशांत
किशोर
ने
2
अक्टूबर
2022
को
अपना
जन
सुराज
अभियान
शुरू
किया
था।
इस
अभियान
में
उन्होंने
मुख्य
रूप
से
रोज़गार,
सुरक्षा
और
शिक्षा
जैसे
मुद्दों
पर
ज़ोर
दिया।
भारत
के
सबसे
सफल
राजनीतिक
रणनीतिकारों
में
से
एक
माने
जाने
वाले
किशोर
ने
पहले
कई
राष्ट्रीय
दलों-
भाजपा,
कांग्रेस,
तृणमूल
और
वाईएसआर
कांग्रेस-
के
लिए
विजयी
रणनीतियां
तैयार
की
थीं।
यह
चुनाव
उनके
लिए
अपने
स्वयं
के
संगठन
के
बैनर
तले
पहली
बार
जनता
के
बीच
उतरने
का
सीधा
राजनीतिक
प्रयोग
था।
रणनीतिकार
से
राजनेता
तक
का
कठिन
सफर
एक
रणनीतिकार
से
राजनेता
बनने
की
किशोर
की
यह
यात्रा
नई
चुनौतियों
और
सिखाने
वाले
अनुभवों
से
भरी
रही
है।
अभियान
के
दौरान
उन्हें
बार-बार
यह
साबित
करना
पड़ा
कि
वे
केवल
रणनीति
नहीं,
बल्कि
सीधी
जन
राजनीति
भी
कर
सकते
हैं।
हालांकि
एग्जिट
पोल
उनके
लिए
निराशाजनक
हैं,
लेकिन
पर्यवेक्षकों
का
मानना
है
कि
यह
उनके
लिए
सीखने
का
अवसर
है-
यह
समझने
का
कि
बिहार
की
राजनीति
में
जनता
की
प्राथमिकताएँ
अभी
भी
पारंपरिक
ढाँचे
के
भीतर
हैं।
आंखें
अब
14
नवंबर
के
नतीजों
पर
फिलहाल,
सबकी
निगाहें
14
नवंबर
2025
को
घोषित
होने
वाले
आधिकारिक
परिणामों
पर
टिकी
हैं।
राजनीतिक
गलियारों
में
चर्चा
है
कि
क्या
अंतिम
परिणाम
एग्जिट
पोल
से
अलग
तस्वीर
पेश
करेंगे,
या
रुझान
सही
साबित
होंगे।
जो
भी
हो,
यह
स्पष्ट
है
कि
जन
सुराज
आंदोलन
और
प्रशांत
किशोर
दोनों
के
लिए
यह
चुनाव
एक
महत्वपूर्ण
मोड़
साबित
होगा-
या
तो
नए
सिरे
से
रणनीति
बनाने
का
अवसर,
या
फिर
राजनीतिक
परिपक्वता
की
परीक्षा।
‘पीके
फैक्टर’
की
गूंज
आज
बिहार
की
राजनीति
में
“पीके
फैक्टर”
को
नजरअंदाज
नहीं
किया
जा
सकता।
कोनर
गांव
के
रास
बिहारी
लाल
कहते
हैं,
“अब
हर
जगह
लोग
जन
सुराज
की
चर्चा
करते
हैं।
भले
ही
उनकी
पार्टी
एग्जिट
पोल
में
हार
रही
है,
लेकिन
जनता
के
बीच
अपनी
उपस्थिति
दर्ज
करा
दी
है।”
इस
खबर
पर
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हमें
कमेंट
में
बताएं।

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