International
oi-Siddharth Purohit
Iran
Protest:
आर्थिक
संकट
में
डूबे
ईरान
के
लोगों
का
सब्र
एक
हफ्ते
पहले
टूट
चुका
था।
लेकिन
पानी
नाक
से
ऊपर
जा
चुका
है।
पहले
कुछ
शहरों
तक
सीमित
ये
प्रदर्शन
अब
देशव्यापी
रूप
ले
चुके
हैं।
ये
प्रदर्शन
सिर्फ
कुछ
दिनों
की
नाराज़गी
नहीं
हैं,
बल्कि
सालों
के
दमन
और
महिलाओं
शोषण
के
बाद
बाहर
आया
है
और
अब
ईरान
के
लोग
ईरान
की
धर्मसत्ता
(इस्लामिक
शासन)
को
चुनौती
दे
रहे
हैं।
हालांकि
ईरानी
सरकार
ने
इन
प्रदर्शनों
की
व्यापकता
को
आधिकारिक
तौर
पर
स्वीकार
नहीं
किया
है,
लेकिन
सुरक्षा
बलों
के
घायल
होने
और
मारे
जाने
की
खबरें
सामने
आई
हैं।
2200
लोगों
को
हिरासत
में
लिया
गया,
38
की
मौत
बुधवार
को
विरोध
प्रदर्शनों
का
सबसे
हिंसक
और
व्यापक
दौर
देखा
गया।
ये
प्रदर्शन
ग्रामीण
कस्बों
से
निकलकर
लगभग
हर
प्रांत
के
बड़े
शहरों
तक
पहुंच
गए।
जिसका
असर
राजधानी
तेहरान
पर
भी
पड़ना
शुरू
हो
गया
है।
अमेरिकी
मानवाधिकार
कार्यकर्ताओं
से
जुड़ी
एक
समाचार
एजेंसी
के
मुताबिक,
अब
तक
इन
हिंसक
झड़पों
में
कम
से
कम
38
लोगों
की
मौत
हो
चुकी
है,
जबकि
2,200
से
अधिक
लोगों
को
हिरासत
में
लिया
गया
है।

खामेनेई
पर
बढ़
रहा
दबाव
इन
प्रदर्शनों
के
फैलने
से
ईरान
की
नागरिक
सरकार
और
सर्वोच्च
नेता
अयातुल्ला
अली
खामेनेई
पर
राजनीतिक
दबाव
तेज़
हो
गया
है।
अब
तक
सरकार
ने
न
तो
इंटरनेट
बंद
किया
है
और
न
ही
सड़कों
पर
भारी
संख्या
में
सुरक्षा
बल
तैनात
किए
हैं,
जैसा
कि
2022
में
महसा
अमिनी
की
मौत
के
बाद
हुए
प्रदर्शनों
के
दौरान
किया
गया
था।
हालांकि,
हालात
बिगड़ने
पर
सरकार
सख्त
कदम
उठा
सकती
है।
आर्थिक
तबाही
बनी
विरोध
की
जड़
ईरान
को
हाल
के
वर्षों
में
कई
देशव्यापी
प्रदर्शनों
का
सामना
करना
पड़ा
है।
अंतरराष्ट्रीय
प्रतिबंधों
के
सख्त
होने
और
जून
में
इजरायल
के
साथ
हुए
12-दिवसीय
युद्ध
के
बाद
हालात
और
बिगड़
गए।
दिसंबर
में
ईरानी
मुद्रा
रियाल
गिरकर
1
डॉलर
के
मुकाबले
1.4
मिलियन
तक
पहुंच
गई।
1979
से
अब
तक
रियाल
की
ऐतिहासिक
गिरावट
1979
की
इस्लामी
क्रांति
से
पहले
रियाल
1
डॉलर
के
मुकाबले
करीब
70
पर
स्थिर
था।
2015
में
परमाणु
समझौते
के
समय
यह
दर
32,000
रियाल
प्रति
डॉलर
थी।
अब
हालात
इतने
खराब
हैं
कि
देशभर
के
बाजारों
में
दुकानदार
भी
विरोध
के
तौर
पर
दुकानें
बंद
कर
रहे
हैं।
कहां-कहां
भाग
सकते
हैं
अली
खामेनेई?
ब्रिटिश
अखबार
ने
खूफिया
सूत्रों
के
हवाले
बताया
है
कि
अली
खामेनेई
ने
अपना
भागने
का
प्लान
बना
लिया
है।
लेकिन
ये
उनका
प्लान
‘बी’
है।
अगर
देश
छोड़ने
की
नौबत
आती
है
तो
अली
खामनेई
अकेले
नहीं
भागेगें।
उनके
साथ
उनके
बेटे
मोजतबा
खामेनेई
भी
जाएंगे।
फिलहाल
उनके
रूस
और
दूसरे
नंबर
पर
मेक्सिको
भागने
की
चर्चा
है।
कहा
जा
रहा
है
कि
दोनों
देशों
से
उनकी
बातचीत
हो
चुकी
है।
रूस
में
सीरिया
के
पूर्व
तानाशाह
बशल-अल-असद
भी
अभी
निर्वासन
काट
रहे
हैं।
महसा
अमिनी
आंदोलन
जितनी
बड़ी
लहर
अभी
नहीं
फिलहाल
ये
विरोध
प्रदर्शन
2022
में
22
वर्षीय
महसा
अमिनी
की
पुलिस
हिरासत
में
मौत
के
बाद
हुए
महीनों
लंबे
आंदोलनों
जितने
बड़े
नहीं
हुए
हैं।
अमिनी
को
हिजाब
न
पहनने
के
आरोप
में
हिरासत
में
लिया
गया
था,
और
उनकी
मौत
महिलाओं
के
अधिकारों
और
आज़ादी
के
प्रतीक
के
रूप
में
उभरी
थी।
विदेशी
असर
की
आशंका
इन
विरोध
प्रदर्शनों
की
सबसे
बड़ी
खासियत
यह
है
कि
इनका
कोई
स्पष्ट
नेता
सामने
नहीं
आया
है।
फिर
भी,
निर्वासन
में
रह
रहे
युवराज
रजा
पहलवी
की
ओर
से
दिए
गए
आह्वान
के
बाद
यह
परखा
जा
रहा
है
कि
क्या
प्रदर्शनकारी
किसी
विदेशी
संदेश
या
नेतृत्व
से
प्रभावित
हो
रहे
हैं।
अटलांटिक
काउंसिल
के
ईरान
विशेषज्ञ
नेट
स्वानसन
ने
लिखा
है
कि
पहले
के
आंदोलनों
में
“व्यवहार्य
राजनीतिक
विकल्प
की
कमी”
के
कारण
वे
कमजोर
पड़
गए
थे।
जो
संभावित
नेता
हो
सकते
थे
उन्हें
या
तो
समय
से
पहले
ही
खत्म
कर
दिया
गया
या
फिर
उनकी
आवाज
दबा
दी
गई।
एक
दिन
में
कम
से
कम
37
प्रदर्शन
बुधवार
को
पूरे
देश
में
कम
से
कम
37
अलग-अलग
विरोध
प्रदर्शन
दर्ज
किए
गए।
शिराज़
शहर
में
दंगा-रोधी
ट्रकों
से
पानी
की
तोपों
का
इस्तेमाल
करते
हुए
प्रदर्शनकारियों
को
तितर-बितर
किया
गया।
सरकारी
समाचार
एजेंसी
आईआरएनए,
जो
आमतौर
पर
ऐसे
मामलों
पर
चुप
रहती
है,
उसने
भी
बोजनोर्ड,
करमन
और
करमानशाह
जैसे
शहरों
में
प्रदर्शनों
की
पुष्टि
की।
सुरक्षा
बलों
पर
हमले,
मौत
और
घायल
होने
की
घटनाएं
न्यायपालिका
से
जुड़ी
मिज़ान
समाचार
एजेंसी
के
अनुसार,
तेहरान
के
बाहर
एक
कस्बे
में
एक
पुलिस
कर्नल
को
चाकू
के
गंभीर
घाव
लगे,
जिससे
उनकी
मौत
हो
गई।
वहीं
फ़ार्स
समाचार
एजेंसी
ने
बताया
कि
लूर्देगान
शहर
में
बंदूकधारियों
ने
दो
सुरक्षा
कर्मियों
की
हत्या
कर
दी
और
करीब
30
अन्य
को
घायल
कर
दिया।
गुरुवार
को
कुर्दिस्तान
प्रांत
में
व्यापारियों
ने
विरोध
के
तौर
पर
अपनी
दुकानें
बंद
रखीं।
शाह
समर्थक
नारे,
लेकिन
संदेश
अस्पष्ट
कुछ
प्रदर्शनों
में
शाह
के
समर्थन
में
नारे
भी
लगाए
गए।
हालांकि
यह
साफ
नहीं
है
कि
यह
सीधे
रजा
पहलवी
के
लिए
समर्थन
है
या
फिर
1979
की
इस्लामी
क्रांति
से
पहले
के
दौर
में
लौटने
की
इच्छा
का
प्रतीक।
एक
एक्सपर्ट
अली
रहमानी,
“हर
आंदोलन
में
वही
मांगें
सामने
आती
हैं-इस्लामिक
गणराज्य,
पितृसत्तात्मक,
तानाशाही
और
धार्मिक
शासन,
और
मौलवी-मुल्लाओं
के
शासन
का
अंत।”
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