International
oi-Siddharth Purohit
Taliban
के
मंत्री
को
‘ग्रेटर
अफगानिस्तान’
का
नक्शा
भेंट
करने
से
विवाद
गहरा
गया
है।
इस
नक्शे
में
पाकिस्तान
के
कई
प्रांत-
जैसे
खैबर
पख्तूनख्वा
(KPK),
गिलगित-बाल्टिस्तान
(GB),
और
बलूचिस्तान-
को
अफगानिस्तान
का
हिस्सा
दिखाया
गया
है।
दूसरी
तरफ,
तालिबान
ने
एक
बार
फिर
डूरंड
लाइन
(मौजूदा
अफगानिस्तान
पाकिस्तान
बॉर्डर)
को
मान्यता
देने
से
इनकार
कर
दिया
है,
जिससे
पाकिस्तान
के
साथ
सीमा
पर
तनाव
और
बढ़
गया
है।
तालिबान
का
डूरंड
लाइन
पर
रुख
स्पष्ट
सूत्रों
के
अनुसार,
तालिबान
डूरंड
लाइन
को
एक
“आर्टिफिशियल
कॉलोनियल
बॉर्डर”
मानता
है।
तालिबान
के
एक
मंत्री
को
‘ग्रेटर
अफगानिस्तान’
का
नक्शा
उपहार
में
देना
पाकिस्तान
के
खिलाफ
एक
जानबूझकर
किया
गया
प्रतीकात्मक
कदम
माना
जा
रहा
है।
यह
नक्शा
अल-मदरसा
अल-असरिया
के
छात्रों
ने
तालिबान
के
उप
मंत्री
मोहम्मद
नबी
ओमारी
को
भेंट
किया
था।

पाकिस्तान
के
प्रांतों
को
अफगानिस्तान
में
दिखाया
यह
नक्शा
इसलिए
विवाद
का
केंद्र
बना
क्योंकि
इसमें
पाकिस्तान
के
कुछ
प्रांतों
को
अफगानिस्तान
का
अभिन्न
हिस्सा
दर्शाया
गया
था।
‘ग्रेटर
अफगानिस्तान’
या
‘पश्तूनिस्तान’
की
अवधारणा
दशकों
से
दोनों
देशों
के
बीच
विवाद
का
विषय
रही
है।
अफगानिस्तान
ने
कभी
भी
डूरंड
लाइन
को
पाकिस्तान
के
साथ
अपनी
आधिकारिक
सीमा
के
रूप
में
स्वीकार
नहीं
किया
है।
Afghan Taliban slaps Pakistan. Afghan students presented a “Greater Afghanistan” map to Taliban Deputy Interior Minister Mohammad Nabi Omari in Khost, Afghanistan. The map is depicting territories beyond the Durand Line, including areas in Pakistan today.pic.twitter.com/ZrQMpRLpA1
— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) November 2, 2025 “>
डूरंड
लाइन
का
इतिहास
1893
में
ब्रिटिश
राज
के
दौरान
खींची
गई
डूरंड
लाइन
ने
पश्तून
आबादी
को
दो
देशों
में
विभाजित
कर
दिया
था।
अफगान
राष्ट्रवादी
हमेशा
से
उन
पश्तून-बहुसंख्यक
इलाकों
पर
दावा
करते
आए
हैं
जो
वर्तमान
में
पाकिस्तान
का
हिस्सा
हैं।
यह
हालिया
विवाद
भी
दोनों
देशों
के
बीच
चल
रही
सीमा
झड़पों
के
बीच
सामने
आया
है।
इस्तांबुल
शांति
वार्ता
और
सीजफायर
हाल
ही
में
इस्तांबुल
में
हुई
शांति
वार्ता
के
बाद
पाकिस्तान
और
अफगानिस्तान
ने
अस्थायी
रूप
से
संघर्ष-विराम
बनाए
रखने
पर
सहमति
जताई
है।
हालांकि,
इसी
सप्ताह
की
गई
पिछली
बातचीत
फेल
हो
गई
थी।
पाकिस्तान
ने
कहा
कि
तालिबान
सरकार
से
मिले
कुछ
“आश्वासन”
के
बाद
सीमा
पर
संघर्ष-विराम
कायम
रहेगा।
तुर्की
की
मध्यस्थता
कारगर!
तुर्की
के
विदेश
मंत्रालय
के
अनुसार,
“सभी
पक्ष
एक
निगरानी
और
जांच
तंत्र
स्थापित
करने
पर
सहमत
हुए
हैं,
जो
शांति
बनाए
रखेगा
और
उल्लंघन
करने
वाले
पक्षों
पर
कार्रवाई
करेगा।”
बताया
गया
कि
दोनों
देश
6
नवंबर
को
इस्तांबुल
में
होने
वाली
उच्च
स्तरीय
बैठक
में
संघर्ष-विराम
के
लागू
करने
की
प्रक्रिया
को
अंतिम
रूप
देंगे।
तालिबान
का
पाकिस्तान
पर
गंभीर
आरोप
तालिबान
और
खुफिया
सूत्रों
के
अनुसार,
पहले
की
अफगान
सरकारों
की
तरह
मौजूदा
तालिबान
शासन
भी
डूरंड
लाइन
को
“आर्टिफीशियल
कॉलोनियल
बॉर्डर”
के
रूप
में
देखता
है।
सूत्रों
ने
कहा
कि
“पाकिस्तान
का
इस
लाइन
के
पूर्व
के
क्षेत्रों
पर
कोई
वैध
दावा
नहीं
है।”
उनका
कहना
है
कि
पाकिस्तान
ने
अमेरिका
के
युद्ध
के
दौरान
अफगान
भूमि
और
लड़ाकों
का
अपने
फायदे
के
लिए
इस्तेमाल
किया।
सीमावर्ती
तनाव
और
अफगान
शरणार्थियों
का
मुद्दा
सूत्रों
ने
आगे
बताया
कि
पाकिस्तान
अब
सीमावर्ती
इलाकों
पर
हमले
कर
रहा
है
और
अफगान
शरणार्थियों
को
निष्कासित
कर
रहा
है,
जिससे
दोनों
देशों
के
रिश्ते
और
बिगड़
गए
हैं।
तालिबान
का
मानना
है
कि
‘ग्रेटर
अफगानिस्तान’
का
नक्शा
प्रस्तुत
करके
वे
राष्ट्रीय
गौरव
का
संदेश
देना
चाहते
हैं
और
पाकिस्तान
के
राजनीतिक
प्रभाव
को
ठुकराना
चाहते
हैं।
अफगान
शरणार्थियों
निकालना
पड़ा
भारी
पाकिस्तान
द्वारा
दस
लाख
से
अधिक
अफगान
शरणार्थियों
को
देश
से
निष्कासित
किए
जाने
को
काबुल
में
अपमान
और
सामूहिक
सजा
के
रूप
में
देखा
जा
रहा
है।
सूत्रों
ने
कहा
कि
“अमीरात
के
तहत
अफगानिस्तान
अब
पाकिस्तान
के
खुफिया
नियंत्रण
या
आदेशों
को
बर्दाश्त
नहीं
करेगा।”
तालिबान
का
मानना
है
कि
पाकिस्तान
सीमा
पर
आक्रामकता
दिखाकर
और
शरणार्थियों
को
निकालकर
अफगान
संप्रभुता
को
कमजोर
कर
रहा
है।
हम
नहीं
मानते
डूरंड
लाइन-
तालिबान
तालिबान
ने
स्पष्ट
किया
है
कि
डूरंड
लाइन
को
मिटाना
पाकिस्तान
की
औपनिवेशिक
वैधता
को
खारिज
करने
का
प्रतीक
है।
उनका
कहना
है
कि
यह
सीमा
न
तो
ऐतिहासिक
रूप
से
न्यायसंगत
है
और
न
ही
जनभावनाओं
के
अनुरूप।
‘ग्रेटर
अफगानिस्तान’
का
विचार
अब
तालिबान
के
लिए
राष्ट्रीय
आत्मसम्मान
और
स्वतंत्रता
का
प्रतीक
बन
गया
है।
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