International
oi-Siddharth Purohit
World
Order
Shifting:
हाल
के
हफ्तों
में
कई
पश्चिमी
देशों
के
नेताओं
ने
चीन
के
साथ
अपने
राजनयिक
और
आर्थिक
रिश्तों
को
दोबारा
मज़बूत
करना
शुरू
किया
है।
यह
कदम
दुनिया
की
दूसरी
सबसे
बड़ी
अर्थव्यवस्था
के
साथ
रिश्तों
पर
नए
सिरे
से
फोकस
को
दिखाता
है।
इस
पहल
में
कनाडा,
फिनलैंड
और
यूनाइटेड
किंगडम
जैसे
देशों
के
शीर्ष
नेता
शामिल
हैं।
जानकार
मानते
हैं
कि
यह
बदलाव
ग्लोबल
जियो
पॉलिटिकल
हालात
में
आ
रहे
बड़े
बदलावों
और
नई
रणनीतिक
प्राथमिकताओं
की
ओर
इशारा
करता
है।
कनाडा
के
पीएम
का
बीजिंग
दौरा
इसी
महीने
की
शुरुआत
में
कनाडा
के
प्रधानमंत्री
मार्क
कार्नी
चीन
की
राजधानी
बीजिंग
पहुंचे।
इस
दौरान
दोनों
देशों
के
बीच
कई
सहयोग
समझौतों
पर
हस्ताक्षर
हुए।
यात्रा
के
बाद
क्यूबेक
सिटी
में
बोलते
हुए
कार्नी
ने
कहा-
“बढ़ती
दीवारों
और
गहरी
होती
सीमाओं
के
इस
दौर
में,
हम
दिखा
रहे
हैं
कि
एक
देश
कैसे
खुला
और
सुरक्षित,
स्वागत
करने
वाला
और
मजबूत,
सिद्धांतों
वाला
और
ताकतवर
हो
सकता
है।”

चीन
यात्रा
को
कार्नी
ने
क्यों
बताया
अहम?
मार्क
कार्नी
ने
साफ
किया
कि
बीजिंग
की
यह
यात्रा
कनाडा
की
एक
बड़ी
और
लंबी
रणनीति
का
हिस्सा
है।
उनका
कहना
था
कि
कनाडा
अब
अस्थिर
या
अनिश्चित
शक्तियों
पर
निर्भर
रहने
के
बजाय
स्वतंत्र
और
आपसी
फायदे
वाली
साझेदारियां
बनाना
चाहता
है,
ताकि
देश
लगातार
आगे
बढ़
सके।
फिनलैंड
का
फोकस:
बिज़नेस
और
निवेश
कनाडा
के
बाद
फिनलैंड
ने
भी
चीन
की
ओर
कदम
बढ़ाया।
फिनलैंड
के
प्रधानमंत्री
पेट्टेरी
ओर्पो
25
जनवरी
से
चीन
के
दौरे
पर
थे।
वह
अपने
साथ
देश
के
शीर्ष
बिज़नेस
लीडर्स
का
एक
प्रतिनिधिमंडल
भी
लेकर
गए
थे।
जिसका
का
मकसद
चीन
और
फिनलैंड
के
बीच
व्यापार
और
निवेश
को
और
मज़बूत
रहा।
आठ
साल
बाद
चीन
पहुंचे
ब्रिटेन
के
पीएम
विश्लेषकों
का
कहना
है
कि
अब
यूरोपीय
देश
चीन
के
साथ
रिश्तों
को
सिर्फ
विकल्प
नहीं,
बल्कि
ज़रूरत
के
तौर
पर
देखने
लगे
हैं।
इसी
कड़ी
में
यूनाइटेड
किंगडम
के
प्रधानमंत्री
कीर
स्टारर
भी
चीन
की
यात्रा
पर
हैं।
पिछले
आठ
साल
में
ये
पहली
बार
है
कि
कोई
ब्रिटिश
प्रधानमंत्री
चीन
की
यात्रा
पर
गया
है।
“चीन
न
जाना
बड़ी
गलती
थी”
ब्रिटेन
के
अख़बार
द
ऑब्ज़र्वर
ने
एक
गुमनाम
सूत्र
के
हवाले
से
बताया
कि
कीर
स्टारर
का
मानना
है
कि
पिछले
प्रधानमंत्रियों
का
चीन
न
जाना
एक
तरह
से
“कर्तव्य
की
अनदेखी”
थी।
इससे
दोनों
देशों
के
रिश्तों
को
नुकसान
पहुंचा।
UK-China
रिश्तों
के
लिए
अहम
दौरा
स्टारर
के
प्रतिनिधिमंडल
में
वरिष्ठ
सरकारी
अधिकारी
और
बड़े
कारोबारी
नेता
शामिल
हुए।
जानकारों
के
मुताबिक,
यह
दौरा
अगले
दो
से
तीन
सालों
में
चीन-ब्रिटेन
रिश्तों
की
दिशा
तय
करने
में
अहम
भूमिका
निभा
सकता
है।
अगले
महीने
जर्मन
चांसलर
भी
जाएंगे
चीन
जर्मन
चांसलर
फ्रेडरिक
मर्ज
अगले
महीने
24
से
27
फरवरी
तक
चीन
के
दौरे
पर
होंगे।
दरअसल
अमेरिकी
टैरिफ
के
चलते
जर्मन
कारों
की
बिक्री
को
झटका
लगा
है।
कहा
जा
रहा
है
कि
ट्रंप
की
इसी
दादागीरी
के
चलते
अब
मर्ज
का
भी
चीन
में
इंट्रस्ट
बढ़ने
लगा
है।
वहीं
जनवरी
की
शुरुआत
में
आयरलैंड
के
प्रधानमंत्री
माइकल
ने
बीजिंग
की
यात्रा
कर
राष्ट्रपति
शी
जिनपिंग
से
मुलाकात
की
थी।
ट्रंप
फैक्टर
और
पश्चिमी
देशों
की
चिंता
पश्चिमी
नेताओं
की
चीन
यात्राओं
में
तेजी
का
एक
बड़ा
कारण
ट्रंप
प्रशासन
की
एकतरफा
नीतियां
भी
मानी
जा
रही
हैं।
इन
नीतियों
ने
अमेरिका
के
सहयोगी
देशों
को
असहज
कर
दिया
है
और
पुराने
सहयोगी
ढांचों
में
तनाव
पैदा
कर
दिया
है।
दावोस
में
ट्रंप
के
बयान
से
मचा
हलचल
दावोस
में
हुए
वर्ल्ड
इकोनॉमिक
फोरम
के
दौरान
अमेरिकी
राष्ट्रपति
डोनाल्ड
ट्रंप
ने
नाटो
की
आलोचना
की,
सहयोगी
देशों
पर
नए
टैरिफ
लगाने
की
धमकी
दी
और
यह
तक
कह
दिया
कि
यूरोपीय
देशों
और
कनाडा
पर
अमेरिका
का
“कर्ज”
है।
इन
बयानों
से
कई
यूरोपीय
नेता
हैरान
रह
गए।
“क्या
वाकई
पुराना
दौर
खत्म
हो
गया?”
पूर्व
अमेरिकी
राष्ट्रीय
सुरक्षा
सलाहकार
फिल
गॉर्डन
के
मुताबिक,
कई
अधिकारियों
ने
उनसे
पूछा,
“क्या
यह
वही
अमेरिका
है?
और
क्या
द्वितीय
विश्व
युद्ध
के
बाद
का
दौर
वाकई
खत्म
हो
गया
है-
या
उसके
लौटने
की
कोई
उम्मीद
बाकी
है?”
चीन
बना
भरोसेमंद
विकल्प
इन
हालातों
ने
पश्चिमी
देशों
को
नए
और
भरोसेमंद
साझेदार
तलाशने
के
लिए
मजबूर
किया
है,
जिसमें
चीन
एक
बड़ा
विकल्प
बनकर
उभरा
है।
चीन
का
विशाल
बाज़ार,
नीतिगत
स्थिरता
और
बहुपक्षीय
सहयोग
के
प्रति
प्रतिबद्धता
उसकी
ताकत
मानी
जा
रही
है।
“चीन
समाधान
देने
वाला
देश
है”यूएस-चाइना
कोऑपरेशन
फाउंडेशन
के
कार्यकारी
अध्यक्ष
जॉन
मिलर-व्हाइट
ने
कहा-
“चीन
यह
दिखाता
है
कि
कोई
देश
दुनिया
को
नए
विचार
और
समाधान
देते
हुए
भी
तेज़ी
से
विकास
कर
सकता
है।”
टेक्नोलॉजी
और
ग्रीन
ग्रोथ
पर
चीन
का
ज़ोर
दावोस
में
चीनी
प्रतिनिधियों
ने
घरेलू
मांग
बढ़ाने,
टेक्नोलॉजी
इनोवेशन
को
तेज़
करने
और
ग्रीन
डेवलपमेंट
को
आगे
बढ़ाने
की
अपनी
प्रतिबद्धता
दोहराई।
इससे
अंतरराष्ट्रीय
साझेदारों
के
लिए
हाई-क्वालिटी
ग्रोथ
में
शामिल
होने
के
नए
मौके
बन
रहे
हैं।
यूरोप
का
समर्थन
फ्रांस
के
राष्ट्रपति
इमैनुएल
मैक्रों
समेत
कई
यूरोपीय
नेताओं
ने
चीन
के
साथ
जुड़ाव
का
समर्थन
किया
है।
उनका
मानना
है
कि
एक
अस्थिर
वैश्विक
अर्थव्यवस्था
में
चीन
एक
स्थिर
करने
वाली
ताकत
साबित
हो
सकता
है।
अब
विकल्प
नहीं,
रणनीति
का
हिस्सा
कनाडा,
फिनलैंड
और
यूनाइटेड
किंगडम
की
हालिया
यात्राएं
साफ
दिखाती
हैं
कि
चीन
के
साथ
सहयोग
अब
कोई
वैकल्पिक
रास्ता
नहीं
रहा।
आलोचकों
का
कहना
है
कि
यह
अब
पश्चिमी
देशों
की
आर्थिक
और
राजनयिक
रणनीति
का
एक
अहम
और
केंद्रीय
हिस्सा
बन
चुका
है।
इस
खबर
पर
आपकी
क्या
राय
है,
हमें
कमेंट
में
बताएं।

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