दिल्ली हाईकोर्ट ने कूड़ा बीनने वाले 11 वर्षीय लड़के से कुकर्म करने के दोषी व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित सड़क पर रहता है और वो हर जानकारी सही दे सके उससे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 11 साल के बेघर लड़के के साथ कुकर्म करने के दोषी व्यक्ति की सजा में दखल देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सड़क पर रहने वाले बच्चे से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह तारीख, समय या कपड़ों के बारे में उतनी ही सटीकता से जानकारी दे सके, जितनी कि एक स्थिर माहौल में रहने वाला गवाह दे सकता है।
आरोपी की याचिका पर 10 अगस्त को पारित फैसले में जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 (कुकर्म) और पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम की धारा-छह (गंभीर रूप से यौन हमला) के तहत उसे दोषी ठहराने संबंधी निचली अदालत के अगस्त 2025 का निर्णय बरकरार रखा। हालांकि, जस्टिस सुधा ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 20 साल जेल की सजा को घटाकर 10 साल कर दिया। इस बारे में अदालत ने यह आधार दिया कि अपराध के समय इस कुकृत्य के लिए 10 साल की सजा का प्रावधान था। पॉक्सो ऐक्ट की धारा-छह के तहत न्यूनतम 20 वर्ष की सजा का प्रावधान 16 अगस्त 2019 से लागू हुआ था।
पुलिस को कैसे मिली घटना की जानकारी
नाबालिग ने आरोप लगाया था कि नवंबर 2016 में जब वह कश्मीरी गेट स्थित रेलवे पुल के नीचे सो रहा था, तब आरोपी ने उसका यौन उत्पीड़न किया। जब नाबालिग ने क्षेत्र में बेघर लोगों को मुफ्त मेडिकल हेल्प प्रदान करने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित करने वाले कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को घटना की जानकारी दी, तो उन्होंने पुलिस हेल्पलाइन पर इसकी सूचना दी थी।
आरोपी के वकील ने दावा किया कि उसे फंसाया गया है और दलील दी कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि लड़के की उम्र 12 वर्ष से कम थी। उन्होंने यह भी कहा कि घटना के समय लड़के ने जो कपड़े पहने थे, उन्हें लेकर उसके बयान में कई विरोधाभास थे।
बचाव पक्ष की दलील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि अपनी सटीक उम्र या जन्म तिथि या अन्य विशिष्ट विवरण बताने में लड़के की असमर्थता का लाभ आरोपी को नहीं मिलेगा।
लड़के ने पहले 15 साल बताई थी अपनी उम्र
हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि अपनी गवाही में पीड़ित ने दावा किया था कि उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष थी, लेकिन उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि को देखते हुए उससे सटीक उम्र जानने की उम्मीद करना ‘अवास्तविक’ है। हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल के रिकॉर्ड में उसकी जन्म तिथि 12 अक्टूबर 2005 दर्ज है, जिससे तय होता है कि घटना के समय उसकी उम्र 11 वर्ष थी।
कोर्ट ने कहा कि नाबालिग लड़के द्वारा दी गई सभी गवाहियों में आरोपी की पहचान, घटना का स्थान, यौन उत्पीड़न की प्रकृति और घटना के तुरंत बाद के घटनाक्रम का क्रम मूल रूप से एक जैसा रहा।
‘चोट के निशान न होने से गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती’
अदालत ने कहा कि घटना के सही समय, लड़के द्वारा पहने गए कपड़ों के विवरण और रंग, तथा एनजीओ के कर्मचारियों और पुलिस के मौके पर पहुंचने के सटीक क्रम को लेकर जो विसंगितयां सामने आई हैं, वे ‘कुकर्म के आरोप को कमजोर नहीं करते।’
अदालत ने यह भी माना कि नाबालिग के शरीर पर चोटों का निशान न होना उसकी ‘सुसंगत और विश्वसनीय गवाही’ पर संदेह करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा, ”यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि गवाह सड़कों पर गुजारा करने वाला बेघर बच्चा था और कूड़ा बीनने का काम करता था, उससे तारीखों, समय या कपड़ों के बारे में उसी सटीकता से विवरण देने की उम्मीद नहीं की जा सकती जितनी कि एक व्यवस्थित माहौल में रहने वाले गवाह से की जाती है।”
