कंधे पर शव, सामने उफनती नदी… एक पुल की कमी कैसे बना रही ‘अंतिम सफर’ को खतरनाक? किशनगंज के गांवों की ग्राउंड हकीकत

शव उठाए नदी पार करते लोग

Bihar News: देश आजादी के 79 वर्ष पूरे कर चुका है. सरकारों की ओर से गांवों तक विकास पहुंचाने के दावे लगातार किए जाते हैं, लेकिन किशनगंज जिले के बहादुरगंज प्रखंड में एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो व्यवस्था के तमाम दावों पर सवाल खड़े करती है. यहां मरने के बाद भी मुर्दे को सुकून नहीं मिलता. अपने ही परिजनों के शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने के लिए लोगों को जान जोखिम में डालकर खकवा नदी तैरकर पार करनी पड़ती है.

सोमवार को सड़क दुर्घटना में मृत 20 वर्षीय शहनसवी बेगम, पिता सईदुर्रहमान, गांव बीरपुर के शव को भी लोगों ने इसी तरह नदी पार कराकर बैसा कब्रिस्तान पहुंचाया. तस्वीरें विचलित करने वाली हैं, लेकिन यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि बहादुरगंज प्रखंड क्षेत्र के दर्जनों गांवों की वर्षों पुरानी हकीकत है. नोदिया टोली-बैसा घाट पर पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को अपने परिजनों के जनाजे को कंधे पर लेकर खकवा नदी में उतरना पड़ता है.

50 एकड़ में फैला कब्रिस्तान

नदी की धारा पार करने के बाद ही शव को बैसा कब्रिस्तान तक पहुंचाया जा सकता है. जिस वक्त परिजन अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने की पीड़ा में होते हैं, उसी वक्त उन्हें नदी की तेज धारा और गहरे पानी से जूझने की मजबूरी भी झेलनी पड़ती है. करीब 50 एकड़ में फैला बैसा कब्रिस्तान नोदिया टोली, चकचकी, झींगाकाटा इस्तमरार, झींगाकाटा तौफीर, दोगाछी, झींगाकाटा, दर्जी टोला, लाटटोला, बैसा, तेघरिया, धापरटोली सहित दर्जनों गांवों के हजारों लोगों के लिए महत्वपूर्ण है.

इन गांवों के लोग पीढ़ियों से इसी कब्रिस्तान में अपने पूर्वजों को दफनाते आ रहे हैं. वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यही उनका अंतिम ठिकाना है, लेकिन कब्रिस्तान तक पहुंचने के रास्ते में खकवा नदी आज भी सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है. नोदिया टोली-बैसा घाट पर पुल का निर्माण नहीं होने से हर जनाजा एक चुनौती बन जाता है.

जान हथेली पर रखकर पार करते हैं नदी

गर्मी के दिनों में किसी तरह लोग नदी पार कर लेते हैं, लेकिन बरसात में खकवा नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ यह रास्ता बेहद खतरनाक हो जाता है. नदी की तेज धार के बीच शव को लेकर पानी में उतरना पड़ता है. कई बार लोगों को पानी में डुबकी लगाते हुए शव को संभालकर दूसरे किनारे तक पहुंचाना पड़ता है. ग्रामीणों के लिए यह केवल आवागमन की समस्या नहीं, बल्कि सम्मानजनक अंतिम विदाई के अधिकार से जुड़ा सवाल है. जिस शव को श्रद्धा और सम्मान के साथ कब्रिस्तान तक पहुंचना चाहिए, उसे पानी की धारा के बीच से निकालना उनकी मजबूरी बन गई है.

ग्रामीणों का आरोप है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी नोदिया टोली-बैसा घाट पर पुल का निर्माण नहीं होना सरकारी तंत्र की उदासीनता को दर्शाता है. इस घाट पर पुल निर्माण को लेकर स्थानीय स्तर पर कई बार आवाज उठाई गई. जनप्रतिनिधियों से लेकर ग्रामीण कार्य विभाग के अधिकारियों तक समस्या पहुंचाई गई, लेकिन ग्रामीणों को अब तक आश्वासन के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ. ग्रामीणों का कहना है कि जब तक नदी पर पुल नहीं बनता, तब तक हर बरसात में यही जोखिम दोहराया जाता रहेगा. किसी दिन नदी पार करते समय कोई बड़ा हादसा हो जाए, इसकी आशंका हमेशा बनी रहती है.

जिला पार्षद प्रतिनिधि ने क्या कहा?

मौके पर पहुंचे जिला पार्षद प्रतिनिधि इमरान आलम ने कहा कि नोदिया टोली-बैसा घाट पर पुल निर्माण की मांग को लेकर कई बार ग्रामीण कार्य विभाग के अधिकारियों से स्थलीय निरीक्षण कराया गया है. उन्होंने बताया कि कुछ दिन पूर्व बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री सुनील कुमार से पटना स्थित उनके कार्यालय में मुलाकात कर इस गंभीर समस्या से अवगत कराया गया. इसके बावजूद अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है.

बार-बार की मांग और आश्वासन के बावजूद पुल निर्माण नहीं होने से ग्रामीणों में मायूसी के साथ आक्रोश भी बढ़ रहा है. लोगों का कहना है कि सड़क, पुल और संपर्क मार्ग किसी भी क्षेत्र के विकास की बुनियादी जरूरत हैं, लेकिन यहां स्थिति यह है कि लोगों को जीते जी नदी पार करने में परेशानी है और मरने के बाद भी अंतिम सफर के लिए नदी से जूझना पड़ता है.

ग्रामीणों ने डीएम और अधिकारी से की ये मांग

ग्रामीणों ने किशनगंज के जिलाधिकारी और बिहार सरकार से नोदिया टोली-बैसा घाट पर खकवा नदी के ऊपर अविलंब पुल निर्माण कराने की मांग की है. उनका कहना है कि पुल बनने से दर्जनों गांवों के हजारों लोगों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलेगी और किसी परिवार को अपने मृत परिजन के शव को लेकर नदी में उतरने की अमानवीय मजबूरी नहीं झेलनी पड़ेगी.

सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं है. सवाल यह है कि आजादी के 79 साल बाद भी क्या किसी परिवार को अपने प्रियजन की अंतिम विदाई के लिए नदी की तेज धार से होकर गुजरना पड़े और वह भी तब, जब इस समस्या की जानकारी वर्षों से संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधियों को है?

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मोहित पंडित

मोहित पंडित ने साल 2004 से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की. नई बात, सन्मार्ग, सोनभद्र जैसे अखबारों में वे अपनी सेवा दे चुके हैं. वे सीमांचल के समाचारों को सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं और स्थानीय घटनाओं को उच्च स्तर पर रिपोर्ट करने में निपुण हैं. उनकी लेखनी में संवेदनशीलता और नैतिकता झलकती है.

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